मणिपुर हिंसा
मणिपुर मे पिछले 9 महीना से हिंसा जारी है। इसी बीच कुछ ऐसे वीडियो सामने आये है। जिसने देश को आश्चर्य डाल दिया है। इस वीडियो मे दो महिलाओं को नग्न करके सडक पर घुमाते हुये दिखाया गया है। जब ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो पूरा देश इस वीडियो को देखकर आश्चर्य चकित हो गया था।
हमारे देश मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी निंदा की थी उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर दोषियों को बख्सा नही जायेगा। वही सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को संज्ञान मे लिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने केन्द्र तथा राज्य सरकार को सख्त कार्यवाही करने का निर्देश जारी किया था चीफ जस्टिस ने यहाँ तक कह दिया था कि सरकार इस पर कार्यवाही करे नही तो हम स्वयं इस मामले मे हस्तक्षेप करेंगे। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम सरकार को कार्यवाही करने के लिये थोडा समय देगें नही तो हम
खुद इस मामले मे हस्तक्षेप करेंगे। आगे कहा गया है कि अदालत को सरकार द्वारा उठाये गये कदमो से अवगत कराया जाना चाहिये जिससे अपराधियों पर हिंसा के लिये मामला दर्ज किया जा सके। वीडियो मे जो दृश्य दिखाये गये थे वो घोर संवैधानिक उल्लंघन को दर्शाते है और महिलाओं को हिंसा के साधन के रूप मे इस्तेमाल करके मानव जीवन का उल्लंघन करना संवैधानिक लोकतंत्र के बिल्कुल खिलाफ है।
मणिपुर मे हिंसा क्यो भडकी तथा इस हिंसा की शुरूआत कब हुई
दोस्तो दरअसल मणिपुर की राजधानी इम्फाल बिल्कुल बीच मे है। ये पूरे प्रदेश का लगभग 10% हिस्सा है जिसमे प्रदेश की 57% आबादी रहती है बाकी चारो तरफ 90% हिस्से मे पहाड़ी इलाके है। जहाँ प्रदेश की 43% आबादी रहती है। इम्फाल घाटी वाले इलाके मे मैतेई समुदाय की आबादी ज्यादा है। यहाँ पर ज्यादातर हिंदू रहते है। मणिपुर की कुल आबादी मे इनकी हिस्सेदारी करीब 53% है। आंकडो के अनुसार सूबे के कुल 60 विधायकों मे से 40 विधायक मैतेई समुदाय से है।
वही दूसरी ओर पहाड़ी इलाको मे 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती है इनमे प्रमुख रूप से नागा तथा कुकी जनजातियां है। ये दोनो ही जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई है इसके अतिरिक्त मणिपुर मे आठ-आठ प्रतिशत आबादी मुस्लिम और सनमही समुदाय की है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 371C के अनुसार मणिपुर की पहाडी जनजातियों को विशेष दर्जा तथा सुविधाये मिली हुई है। जो कि मैतेई समुदाय को नही मिलती। लैंड रिफार्म एक्ट की वजह से मैतेई समुदाय पहाडी इलाकों मे जमीन खरीदकर नही बस सकता।
जब कि जनजातियों पर पहाडी इलाके से घाटी मे आकर बसने पर कोई रोक नही है इसी की वजह से दोनो समुदाय मे मतभेद बढे है।
अब आप ये समझिये कि मणिपुर हिंसा की शुरूआत कब हुई
दोस्तो मौजूदा तनाव की शुरूआत चुराचंदपुर जिले से हुई। ये राजधानी इम्फाल के दक्षिण मे करीब 63 किलोमीटर की दूरी पर है। इस जिले मे कुकी आदिवासी ज्यादा है। गवर्नमेंट लैंड सर्वे के विरोध मे 28 अप्रैल को द इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने चुराचंदपुर मे आठ घंटे बंद का एलान किया था।
देखते ही देखते इस बंद ने हिंसा का रूप धारण कर लिया। उसी रात तुइबोंग एरिया मे उपद्रवियों ने वन विभाग के आफिस को आग के हवाले कर दिया। 27-28 अप्रैल की हिंसा मे मुख्य रूप से पुलिस और कुकी आदिवासी आमने सामने थे। इसके ठीक पाँचवे दिन अर्थात 3 मई को आल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन आफ मणिपुर ने आदिवासियो ने एकता मार्च निकाला। ये मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा देने के विरोध मे था। यही से मामला बिगड़ गया आदिवासियों के इस प्रदर्शन के विरोध मे मैतेई समुदाय के लोग खडे हो गये
अब लडाई के तीन पक्ष हो गये। एक तरफ मैतेई समुदाय के लोग थे तो दूसरी तरफ कुकी और तीसरी तरफ नागा समुदाय के लोग थे। देखते ही देखते पूरा प्रदेश इस हिंसा की आग मे जलने लगा। 4 मई को चुराचंदपुर मे मुख्यमंत्री बीरेंद्र सिंह की एक रैली होने वाली थी जिसकी पूरी तैयारी हो गई थी लेकिन रात मे ही उपद्रवियों ने टेंट और कार्यक्रम स्थल पर आग लगा दी अतः मुख्यमंत्री का कार्यक्रम स्थगित हो गया। अभी तक इस हिंसा के चलते 150 से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे तथा 3000 से ज्यादा लोग घायल बताये जा रहे है।
हिंसा का कारण
मणिपुर मे होने वाली हिंसा के मुख्य रूप से तीन कारण है जो कि निम्नलिखित है।
(1) मैतेई समुदाय के एसटी दर्जे का विरोध
मणिपुर में मैतेई ट्राइब यूनियन पिछले कई वर्षों से मैतेई समुदाय को आदिवासी दर्जा देने की मांग कर रही है। जब यह मामला मणिपुर कोर्ट पहुंचा तो इस पर सुनवाई करते हुये मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से 19 अप्रैल को दस साल पुरानी केन्द्रीय जनजातियों के मामले के मंत्रालय की सिफारिश प्रस्तुत करने के लिये कहा था। इस सिफारिश मे मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने के लिये कहा गया है। कोर्ट ने मैतेई समुदाय को आदिवासी दर्जा देने का आदेश दिया अब हाईकोर्ट के इस मामले को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच केस की सुनवाई कर रही है।
(2) सरकार की अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्यवाही
आरक्षण विवाद के बीच मणिपुर सरकार ने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्यवाही ने आग मे घी डालने का काम किया था। मणिपुर सरकार के अनुसार आदिवासी समुदाय के लोग संरक्षित जंगलो वन अभ्यारण्य मे गैरकानूनी कब्जा करके अफीम की खेती कर रहे है। इसी कब्जा को हटाने के लिये सरकार मणिपुर फारेस्ट रूल 2021 के तहत फारेस्ट लैंड पर किसी तरह के अतिक्रमण को हटाने के लिये एक अभियान चला रही है। वही आदिवासियों का कहना है कि ये उनकी पैतृक जमीन है अतः उन्होंने अतिक्रमण नही किया है बल्कि सालो से वहाँ पर रहते आ रहे है। सरकार के इस अभियान को आदिवासियों ने अपनी पैतृक जमीन से हटाने की जगह पेश किया जिसकी वजह से आक्रोश फैला।
(3) कुकी विद्रोही संगठनो ने सरकार से हुये समझौते को तोडा
हिंसा के बीच कुकी विद्रोही संगठनों ने भी सन् 2008 मे हुये केन्द्र सरकार के साथ समझौते को तोड दिया। कुकी जनजाति के कई संगठन सन् 2005 तक सैन्य विद्रोह मे शामिल रहे है। आपको बताते चले की मनमोहन सिंह के सरकार के समय सन् 2008 मे तकरीबन सभी कुकी विद्रोही संगठनों से केन्द्र सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य कार्यवाही रोकने के लिये सस्पेंशन आफ आपरेशन अर्थात SoS एग्रीमेंट किया। इसका मकसद राजनीतिक बातचीत को बढावा देना था।
तब समय-समय पर समझौते का कार्यकाल बढाया जाता रहा लेकिन इस वर्ष 10 मार्च को मणिपुर सरकार कुकी समुदाय के दो संगठनों के लिये इस समझौते से पीछे हट गई। इन दोनो संगठनों का नाम जोमी रेवुलुशनरी आर्मी और कुकी नेशनल आर्मी है। ये दोनो ही संगठन हथियारबंद है। हथियारबंद इन दोनो संगठनों के लोग भी मणिपुर की हिंसा मे शामिल हो गये और सेना तथा पुलिस पर हमला करने लगे।
हथियारबंद आतंकी संगठन सेना के जवानों के सामने
मणिपुर के मौजूदा हालात इस कदर खराब हो चुके हैं की सेवा भी अब उसे कंट्रोल नहीं कर पा रही है लोकल हथियारबन संगठन सेवा का रास्ता रोक रहे हैं जगह-जगह विस्फोट कर रहे हैं ऐसा ही एक विस्फोट 25 फरवरी को किया गया जिसमें दो लोगों की जान गई
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