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UCC समान नागरिक संहिता क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों है, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की क्या राय है?

करीब 74 साल पहले नवंबर के आसपास दिल्ली राज्यसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर चर्चा हुई थी. सवाल यह था कि क्या यूसीसी को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए। वह 23 नवंबर, 1948 का दिन था। लेकिन अंत में मुझे इस मामले में कोई नतीजा नहीं मिला।
आज 74 वर्ष बाद भी. इस बारे में कुछ नहीं किया जा सका. आज, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में होने पर, देश के लगभग हर शहर में, चाय की दुकानों से लेकर पान की दुकानों तक, यह चर्चा है कि सरकार यूसीसी लागू करेगी क्योंकि 'एक देश, एक कानून' का विचार सार्वभौमिक है। आज हर व्यक्ति के दिमाग में है। नागरिकों को उम्मीद है क्योंकि मोदी सरकार पहले भी कठिन फैसले लेने के लिए जानी जाती है.
यूसीसी (समान नागरिक संहिता) क्या है, विशेषज्ञ क्यों सोचते हैं कि हमें इसकी आवश्यकता है, और सुप्रीम कोर्ट ने अब तक क्या कहा है?

क्‍या है Uniform civil code?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। इसका अर्थ है एक निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है।


क्‍यों जरूरी Uniform civil code?

एकीकृत नागरिक संहिता की आवश्यकता क्यों है?

दरअसल, दुनिया के किसी भी देश में जाति और धर्म के आधार पर अलग कानून नहीं है। लेकिन भारत में अलग-अलग संप्रदायों में विवाह प्रथाएं हैं। इसके कारण विवाह, जनसंख्या आदि सहित कई प्रकार की सामाजिक संरचना प्रभावित होती है। इसलिए, देश के कानूनों में सभी धर्मों, जातियों, वर्गों और संप्रदायों को एक प्रणाली में जोड़कर एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जब तक देश के संविधान में ऐसी संभावना या परिवर्तन का प्रावधान नहीं किया जाएगा, तब तक भारत की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भी स्पष्ट नहीं होगा।

इसके अलावा, न्यायपालिका पर विभिन्न धर्मों के अलग-अलग कानूनों का बोझ है। इस मसले को सुलझा लिया गया है और जल्द ही कोर्ट का फैसला सुनाया जाएगा. आपका धर्म चाहे जो भी हो, जब विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे की बात आती है तो सभी पर समान नियम लागू होते हैं। आज सभी धर्मों के लोग व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर इन समस्याओं का समाधान करते हैं।


महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा: Uniform civil code

अगर ऐसा हुआ तो महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा. कुछ धर्मों के व्यक्तिगत कानून महिलाओं के अधिकारों को प्रतिबंधित करते हैं। इसी तरह के नियम पैतृक संपत्ति, महिलाओं के बच्चों को गोद लेने के अधिकार आदि पर भी लागू होते हैं।

किस को कानून से बाहर रखा जाएगा

ट्राईबल क्षेत्र के 14 से 15 करोड लोगों को इस कानून से बाहर रखा गया है सवाल पूछे जाने पर सरकार जवाब देती है कि ट्राईबल एरिया धारा 371 के तहत आता है उसमें हम कोई बदलाव नहीं कर सकते


भारत में आज भी 60% हिंदुओं में बाल विवाह की प्रथा चली आ रही है हिंदू धर्म में कई समाज ऐसे हैं जो आज भी बाल विवाह पर विश्वास करते हैं उनके यहां बालिकाओं की शादी 10 से 12 साल के बीच में हो जाती है और दुल्हन की विदाई 15 या 17 साल की उमर में करते हैं कुछ लोग तो 12 या 14 साल की उम्र में ही अपनी बच्चों  की शादी कर देते हैं

(रिपोर्ट)

युनुस खान भोपाल 

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